यारों, दोस्ती बड़ी ही हसीन है

For my sister

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मुहब्बत है जो की जाये, इश्क़ अपने से हो जाता है
वली और बशर में फ़र्क़ यहीं से ही शुरू हो जाता है

सीने में तूफां का डर तो रखते हैं हम भी, लेकिन
याद तुम्हारी आ जाये  तो फिर आपा खो जाता है

ज़ख्मों पर लबों से जाने क्या लिखकर तुम चले गये
दीवाना उनको पढ़कर अपने ही समझ रो जाता है

उफ़, ग़म-ऐ-उल्फत ज़बां से ज़िक्र  करें भी तो कैसे
माली ही तो ग़ुल के संग काँटे भी बो जाता है

मैला है आँचल मेरा धूल और मिट्टी से सना हुआ
जाने कौन आकर अनजाने में उसको  धो जाता है

ज़ालिम हो जो मिलते हो तुम किसी ग़ैर से उसी तरह
जलते रहते हैं हम और वो क़म्बख्त सो जाता है

बेगरज़ वो दोस्ती क्या जो न हो हर दम ‘सुन्दर’
वैसे ही चला आये चला ऐसे ही जो जाता है

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~ by Bombadil on September 22, 2009.

2 Responses to “यारों, दोस्ती बड़ी ही हसीन है”

  1. Wow. Bahut chot khayee hai tumne, lagta hai aise

  2. Dearest PP

    ज़ख्मों पर लबों से जाने क्या लिखकर तुम चले गये
    दीवाना उनको पढ़कर अपने ही समझ रो जाता है

    Ha ha ha!

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