Pre-Marital

To whom it may concern,
who shall tolerate my worship for the rest of her life
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देखो महाभारत मेरे मन में छिड़ी हुई है
दर्शन के बाद ही से तपस्या कड़ी हुई है

हारने के डर से हृदय में जो स्पंदन है
छीनने को आगे ये दुनिया अड़ी हुई है

आगे ही बढ़ते रहना संकल्प हमारा है
ये जान के ही पीछे  पराजय पड़ी हुई है

आखिर तो इस रण में हो जाना समर्पण है
क्या देखते रहने को दृष्टि बड़ी हुई है

अगला भी जानती है, पिछला भी जानती है
ऐसी निगाह मेरी नज़र से लड़ी हुई है

तारों भरी निशा में सिन्दूर की रेखा है
रौशनी लपेटे  तेरी मूरत खड़ी हुई है

चेहरे की इबादत मन्ज़ूर क्या नहीं है
मुस्कान भी साहब की मोती जड़ी हुई है

होना  है धर्म जिनका ‘सुन्दर’ वो  हो रहे  हैं
शायद किसीकी रचना मन में गड़ी हुई है

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~ by Bombadil on September 28, 2009.

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